नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को एक दिलचस्प सुनवाई हुई, जहां राष्ट्रपति द्वारा मांगी गई सलाह को लेकर दायर याचिकाओं पर बहस हुई। कोर्ट ने खुद सवाल उठाया कि अगर राष्ट्रपति सलाह मांग रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? इस मामले में तमिलनाडु और केरल सरकारों ने राष्ट्रपति रेफरेंस की स्वीकार्यता पर ही सवाल खड़े कर दिए।
चीफ जस्टिस बी आर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने साफ किया कि वे एक सलाहकार क्षेत्राधिकार में हैं। केंद्र सरकार ने इस पर अपनी राय रखते हुए कहा कि राज्यपालों और राष्ट्रपति पर किसी भी तरह की समय-सीमा थोपना संवैधानिक अव्यवस्था पैदा कर सकता है।
राष्ट्रपति ने क्यों मांगी सुप्रीम कोर्ट से सलाह?
दरअसल, मई 2025 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट से एक अहम सवाल पूछा था। वह जानना चाहती थीं कि क्या न्यायिक आदेश राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर विचार करते समय राष्ट्रपति द्वारा विवेकाधिकार के प्रयोग के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित कर सकते हैं?
केंद्र सरकार का बड़ा बयान: ‘संवैधानिक अव्यवस्था’ का खतरा!
केंद्र सरकार ने अपने लिखित जवाब में साफ किया कि राज्य विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति पर कोई निश्चित समय-सीमा थोपना संविधान के खिलाफ होगा। उनका कहना था कि ऐसा करने से सरकार का एक अंग उन शक्तियों का प्रयोग करेगा जो उसे संविधान ने नहीं दी हैं, और इससे देश में ‘संवैधानिक अव्यवस्था’ फैल सकती है।
केरल सरकार ने उठाए सवाल, पुराने फैसलों का दिया हवाला
केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. के. वेणुगोपाल ने इस मामले में कई पुराने फैसलों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200, जिसके तहत राज्यपालों को राज्य के विधेयकों पर ‘यथाशीघ्र’ कार्रवाई करने की आवश्यकता होती है, से संबंधित इसी तरह के प्रश्नों की व्याख्या सुप्रीम कोर्ट पंजाब, तेलंगाना और तमिलनाडु से जुड़े मामलों में पहले ही कर चुका है।
वेणुगोपाल ने जोर देकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल की शक्तियों की व्याख्या कई बार की है। उन्होंने तमिलनाडु (राज्य बनाम राज्यपाल) मामले का जिक्र किया, जहां पहली बार विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों पर स्वीकृति के लिए समय-सीमा तय की गई थी।
उन्होंने तर्क दिया कि ये मुद्दे अब अनसुलझे नहीं रह गए हैं। एक बार जब सुप्रीम कोर्ट इन क्षेत्रों को कवर कर चुका है, तो नए राष्ट्रपति संदर्भ पर विचार नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भारत सरकार को राष्ट्रपति से संदर्भ लेने के लिए अनुच्छेद 143 का सहारा लेने के बजाय औपचारिक समीक्षा की मांग करनी चाहिए थी।
वेणुगोपाल ने अंत में कहा कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 74 के तहत मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से बंधे हैं, जिससे उनके विवेकाधिकार की गुंजाइश बहुत कम बचती है।
